जब तक जीव बंधन से मुक्त नहीं होगा तब तक उसका कल्याण नहीं हो सकता : हरि वंश दास

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झांसी। जीव और ईश्वर दो ही पात्र हैं हम कैसे छूटेंगे जिन्होंने बांधा है जिन्होंने बांधा है वहीं छोड़ पाएंगे और इसके लिए गुरु की आवश्यकता है “आते ना परमेश जो गुरुदेव के आकार में रहता ही अंधेरा अंधेरा ही जीवन में गुरुदेव के चरणारबिंद्र की शरण जब तक न मिली दिन जिंदगी के कितने गए बेकार में”अर्थात गुरु ही वह तत्व है जो जीव को ईश्वर से जोड़ता है और फिर जीवन आसान होता चला जाता है।

हमारा सुख हमारी सोच पर निर्भर करता है और हमारी सोच गुरुदेव के मार्गदर्शन में चलने से सही दिशा पकड़ लेती है स्थिति से अधिक मन स्थिति हमारे जीवन में सुख दुख का निर्धारण करती है हमारी जिंदगी में शिकायतों का कारण अभाव नहीं बल्कि हमारा स्वभाव होता है हम अपने दुख का कारण सदैव दूसरे को मानते हैं जबकि यह हमारे कर्मों का परिणाम होता है और हमें सिर्फ खोने का दुख मनाना आता है लेकिन कुछ पाने की खुशी नहीं अगर हम खुशी के लिए काम करेंगे तो खुशी ही मिले यह आवश्यक नहीं है परंतु खुश होकर काम करेंगे तो खुशी अवश्य मिलेगी।

सुख-दुख रूपी दो नदियों के संगम का नाम ही जीवन है जिंदगी से शिकायत करने की अपेक्षा जो प्राप्त है उसका आनंद लेना सीखना चाहिए यही जीवन की वास्तविक उपलब्धि है शांति एवं आनंद उसी को प्राप्त होता है जिसकी दृष्टि में क्या खो दिया की अपेक्षा क्या पाया है इस पर होती है वह हमेशा भीतर से प्रसन्न रहता है इस तरह मन प्रसन्न रहने से तन अपने आप प्रसन्न रहता है और हमारे तन के दुखों का शमन कर देता है
मानस गायत्री के रूप में तुलसीदास जी ने हमें जनक सुता जग जननि जानकी अतिशय प्रिया करुणा निधान की ताके युगपद कमल मनावो जासु कृपा निर्मल मति पावो गायत्री मंत्र के रूप में इसका जाप करना चाहिए। प्रारंभ में ग्रंथ पूजन सुधीर सिंह जिला अध्यक्ष भाजपा, मृदुलकांत श्रीवास्तव डी जीसी, सोमेंद्र सिंह ,वीरेंद्र पटेल सर्वेश पटेल, पुजारी रामेश्वर प्रसाद उपाध्याय, विनोद समाधिया ने किया।

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